Tuesday, November 18, 2014

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मैंने सुना है रोम में एक बहुत प्रसिद्ध लोहार हुआ। उसकी प्रसिद्धि सारी दुनिया में थी, क्योंकि वह जो भी बनाता था वह चीज बेजोड़ होती थी। उस लोहार की दुकान पर बनी तलवार का कोई सानी न था। और उस लोहार की दुकान पर के सामानों का सारे जगत् में आदर था; दूर-दूर के बाजारों में उसकी चीजें बिकती थीं, उसका नाम बिकता था। फिर रोम पर हमला हुआ। और रोम में जितने प्रतिष्ठित लोग थे, पकड़ लिए गए। रोम हार गया। वह लोहार भी पकड़ लिया गया। वह तो काफी ख्यातिलब्ध आदमी था। उसके बड़े कारखाने थे। और उसके पास बड़ी धन-सम्पत्ति थी, बड़ी प्रतिष्ठा थी। वह भी पकड़ लिया गया। तीस रोम के प्रतिष्ठित जो सर्वशत्तिमान आदमी थे पकड़ कर दुश्मनों ने जंजीरों और बेड़ियों में बांध कर पहाड़ों में फेंक दिया मरने के लिए। जो उनतीस थे वे तो रो रहे थे, लेकिन वह लोहार शांत था। आखिर उन उनतीसों ने पूछा कि तुम शांत हो, हमें फेंका जा रहा है जंगली जानवरों के खाने के लिए! उसने कहा, फिक्र मत करो, मैं लोहार हूं। जिंदगी भर मैंने बेड़ियां और हथकड़ियां बनाई हैं, मैं खोलना भी जानता हूं। तुम घबड़ाओ मत। एक दफा इनको फेंककर चले जाने दो, मैं खुद भी छूट जाऊंगा, तुम्हें भी छोड़ लूंगा। तुम डरो मत। तो लोगों को हिम्मत आ गई, आशा आ गई। बात तो सच थी, उससे बड़ा कोई कारीगर न था। जरूर जिंदगीभर ही लोहे के साथ खेल खेला है, तो जंजीरें न खोल सकेगा! खोल लेगा। यह बात भरोसे की थी। फिर दुश्मन उन्हें फेंककर गङ्ढों में, चले गए। वे सब घिसट कर किसी तरह उस लोहार के पास पहुंचे। पर वह लोहार रो रहा था। उन्होंने पूछा कि मामला क्या है? तुम और रो रहे हो? और हमने तो तुम पर भरोसा किया था। और हम तो तुम्हारी आशा से जीते रहे अब तक। हम तो मर ही गए होते। तुम क्यों रो रहे हो? हुआ क्या? अब तक तो तुम प्रसन्न थे। उसने कहा कि मैं रो रहा हूं इसलिए कि मैंने जब गौर से जंजीरें देखीं तो उन पर मेरे ही हस्ताक्षर हैं, वे मेरी ही बनाई हुई हैं। मेरी बनाई जंजीरें तो टूट ही नहीं सकतीं। ये किसी और की बनाई होती तो मैंने तोड़ दी होतीं। लेकिन यही तो मेरी कुशलता है कि मेरी बनाई जंजीर टूट ही नहीं सकती। असंभव है। यह नहीं हो सकता। मरना ही होगा। उस लोहार की कहानी जब मैंने पढ़ी तो मुझे याद आयाः यह तो हर संसारी आदमी की कहानी है। आखीर में तुम एक दिन पाओगे कि तुम्हारी ही जंजीरों में फंसकर तुम मर गए। तुमने बड़ी कुशलता से उनको ढाला था। तुम्हारे हस्ताक्षर उन पर हैं। तुम भलीभांति पहचान लोगे कि यह अपने ही हाथ का जाल है। इस पूरे सिद्धांत का नाम कर्म है। तुम ही बनाते हो। तुम्हीं ये सींखचे ढालते हो। तुम्हीं ये पिंजरे बनाते हो। फिर कब तुम इनमें बंद हो जाते हो, कब द्वार गिर जाता है, कब ताले पड़ जाते हैं, तुम्हें समझ में नहीं आता। ताले भी तुम्हारे बनाए हुए हैं। शायद तुमने किसी और कारण से दरवाजा लगा लिया था–सुरक्षा के लिए। लेकिन अब खुलता नहीं। शायद हाथ में तुमने जंजीरें पहन ली थीं, आभूषण समझ कर। अब जब पहचान आई है तो अब खुलती नहीं, क्योंकि आभूषण तो नहीं जंजीरें थीं।

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